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ग्रैंडपेरेंट्स एंड ग्रैंडचिल्ड्रंस दिवस March 18, 2010

Posted by aglakadam in Life and all.
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तेजी से भागते समय में संयुक्त परिवारों का चलन भले ही कम हो गया हो, लेकिन घरों में दादा-दादी की मौजूदगी की महत्ता अपनी जगह कायम है। इस बात से सभी सहमत हैं कि घरों में बुजुर्गों की मौजूदगी बच्चों को न केवल संस्कारयुक्त बनाती है, बल्कि उन्हें असामाजिकता और आपराधिक प्रवृत्ति की ओर झुकने से भी बचाती है।

समाजशास्त्री डॉ. भूपेंद्र गौतम ने कहा कि बदलते परिवेश में बच्चों की सही देखभाल के लिए घरों में दादा-दादी का होना जरूरी हो गया है। डॉ. गौतम ने कहा समाज का स्वरूप बहुत बदल गया है। संयुक्त के स्थान पर एकल परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ गई है, लेकिन अभी भी कई पहलुओं को ध्यान में रखते हुए बच्चों के लिए घरों में बुजुर्गों के रूप में दादा-दादी या नाना-नानी की मौजूदगी जरूरी है।
डॉ. गौतम ने कहा कई अध्ययनों से साबित हुआ है कि जिन घरों में बच्चे बुजुर्गों की छत्र-छाया में पलते हैं, उनमें आपराधिक प्रवृत्ति कम दिखती है। दिल्ली जैसे शहरों में युवाओं में अपराध की ओर झुकाव के बहुत मामले दिखाई पड़ते हैं, ऐसे में घरों में बुजुर्गों का होना एक सामाजिक जरूरत बन गया है।
पेशे से शिक्षक डॉ. सरोज नारायण का मानना है कि घर में दादा-दादी की मौजूदगी बच्चों में सामाजिकता का विकास करती है। डॉ. सरोज ने कहा घर में अगर बच्चों के दादा-दादी रहते हों, तो बच्चों में सामाजिकता और व्यावहारिकता बढ़ती है। आज कल बच्चे भी अपनी दुनिया में व्यस्त और दीन-दुनिया से बेखबर रहते हैं, ऐसे में घर के बड़े ही उन्हें व्यावहारिक ज्ञान दे सकते हैं।
डॉ. सरोज ने कहा बुजुर्गों के साथ रहने वाले बच्चे परिवार की महत्ता को समझते हैं और भौतिकता में पड़ने के बजाए सामाजिकता को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे बच्चों में बचपन में सुनी ’दादी-नानी’ की कहानियों का असर कहीं न कहीं जरूर होता है। काम की व्यस्तता के कारण अपनी बेटी को रोज अपनी मां के पास छोड़ने वाली चिकित्सक शोभा दलाल ने बताया कि उन्हें अब अपनी बेटी में और आया के पास रहने वाले बच्चों के व्यवहार में खासा परिवर्तन दिखाई देता है।
डॉ. शोभा ने कहा यह सौ फीसदी सच है कि जो बच्चे अपने किसी भी ग्रैंड पेरेंट के पास रहते हैं, उनका व्यवहार उन बच्चों से कई गुना बेहतर होता है, जो आयाओं के पास पलते हैं। आया के पास रहने वाले बच्चे अपने अभिभावकों से दूर हो जाते हैं।
उन्होंने कहा ’कामकाजी मां अपने बच्चों को आया के पास या क्रैच में छोड़ती हैं। ऐसे बच्चों का उस दुनिया से भी संपर्क होता है, जिससे हम उनका संपर्क नहीं कराना चाहते। अभिभावकों को कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने बच्चों को किसी भी ग्रैंड पेरेंट के पास रखें। इससे बच्चों में उपेक्षा की भावना भी नहीं आएगी और उनमें बेहतर संस्कार भी आएंगे। Source :hindi.samaylive.com
Varsha Varwandkar ,Career Counsellor http://www.aglakadam.com ,Raipur

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